बुधवार, 8 जुलाई 2009

Pehchaan –Ek Sangharsh


Pehchaan –Ek Sangharsh : जब से इस धरती पर चाहे इंसान हो या जानवर आया है वह अपनी पहचान के लिए हमेशा संघर्ष करता रहा है .अगर हम पुराण काल (पाषाण काल, पत्थर का युग) तब भी वे अपनी पहचान के लिए संघर्ष, जन्म से मरण तक हर जीवित वस्तु अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष पे संघर्ष करता रहा है , जो भी ताक़तवर था उसने अपना अस्तित्व बचा लिया और जो कमज़ोर था वह किताबों के पन्नों या किसी और साधन से सिर्फ अपनी पहचान को इस धरती पर बचा कर रखे है.वह सिर्फ किताबों मे पड़ने वाला इतिहास बन गया, वो औरो की तरह अपना जीवित उदाहरण (नमूना)पेश नहीं कर सकता.मेरे इस लेख को लिखने का ख़याल सिर्फ अपनी विदेश मे हुये कुछ खट्टे मीठे अनुभवों का सार है ! इस लेख द्वारा मैं किसी वर्ग विशेष , किसी जाति, किसी प्रांत, किसी धर्म, किसी भाषा को ठेस पहुँचना नहीं है .अगर किसी को मेरे विचार पसंद न आये तो उसके लिए …… मैं माफ़ी चाहूँगा .

मुझ को अपनी भारत के दो अलग अलग संस्कृति और सोच वाले लोगो के साथ रहने और कुछ समय (वक़्त) बताने का अवसर मिला .

जब मैं पहेली मर्तबा अपने भारत से दूर कारोबार से जर्मनी जाना पड़ा उस वक़्त मेरी उम्र सिर्फ 26-27 की थी . हाला की मैने अपने देश मे खूब यात्रा की थी लेकिन यह विदेश का पहला मौका था तो ज़ाहिर सी बात है एक अलग तरह की दिमाग में कशमकश थी .मैं भारत मे घूमने , लोगो से बात करने और अपने आपको उनके रंग मे ढल लेने मे करीब करीब महारत हासिल हो गए थी.खैर वह दिन बुधवार का था और मैं अपने काम से निकला और शुक्रवार (जुमे )तक उस शहर का अपने काम निपटा चुका था और अपने आशा के अनुरूप काम होने की वजह से काफी खुश था .यूरोप देशों मे चूकि शनिवार(सटर-दे) और रविवार (सन् डे) को कोई काम नहीं होता है , ज़याद तर ऑफ़िस बंद होते है तो मैं भी पिज्जा खाते-खाते थक चुका था और भारती वयांजन्न कि कमी थी और मुझको कोई भी अपने तरह का रेस्त्रां नहीं मिल रहा था मैं भी निकल पड़ा एक अनजान देश मे अपने पेट कि आग को बुझाने के लिए मैं फ्रांकफुर्ट से १२० किलोमीटर दूर मंन्हेइम जा रहा था कि अचानक एक हमारी ही उम्र का नौजवान मेरे पास आकर रुका और बोला कि भाई चेहरे से तो तुम हिन्दुस्तानी (भारत)दिखते हो ,हिन्दुस्तानी शब्द सुनते ऐसा लगा जैसे मैं स्वर्ग पर पहुँच गया हू यह कौन इंसान है जो इतनी भीड़ मे भी अपने वतन के लोगो को आसानी से पहचान लिया. फिर वार्ता का नया दौर चला, बातों बातों बातों मे मैने उसको अपने दिल कि बात बोल दी… भाई यहाँ पिज्जा के अलावा भी कुछ मिलता है जिसमे अपने देश का स्वाद हो, अपने देश कि खुशबू हो. उस दोस्त ने झट से कहा है न उसका घर जहा मुझे पंजाब का तड़का मिलेगा और लस्सी का गिलास भी …. उस दोस्त के घर पर मुझ को अपने घर और देश का एहसास हुवा . यह भारत के उस प्रांत के लोग है जिनसे कि अगर आप एक सवाल करेंगे कि अप्प कहा के रहने वाले है तो उनके मुँह से एक सीधा और प्रकाश की गति से भी तेज़ आने वाला जवाब होगा … इंडिया , भारत या हिंदुस्तान .वह विदेश मे भी रहते हुवे अपने वतन का नाम नहीं भूले उन्होने हमेशा अपने को पहले भारती समझा फिर बाद मे पंजाब का होने का महसूस कराया. इस भौतिक युग मे भी उन्होने अपनी पहचान सिर्फ और सिर्फ एक हिन्दुस्तानी हो ने के लिए हर वक़्त एक संघर्ष करना पड़ता है .उनका प्रेम अपने देश के लोगो चाहे वह किसी भी प्रांत, भाषा , धर्म या जाति के हो सब के लिए एक सामान दिखता है………………………………………………..!

ठीक ऐसा ही लेकिन विपरीत अनुभव मुझको 6 साल बाद खाडी (gulf) के देशो मे हुवा जब मै काम करने गया .ऐसा अनुभव जो मेरे अंदर के इंसान को अपने अनुभव को शब्दों मे कहने पर मजबूर कर देता है .हमारे देश हिंदुस्तान का एक छोटा सा राज्य (प्रान्त) समुद्र से लगा हुवा, शिक्षा मे100% , जिसको हम केरला बुलाते है.जो प्राकर्तिक आभा यानि सुन्दरता के लिए भी जाना जाता है, यहाँ के ऊचे उचे नारियल के पेड़ की अपनी एक अलग पहचान है….. और जहा की आये और विदेशी मुद्रा का मुख्य (main) या तो मसाले है या मैंन पॉवर सप्लाई यानि गल्फ देशो मे लोगो को काम पर जाने और विदेशी मुद्रा को पाने का100% सुरक्षित और सुलभ साधन.अगर आपकी कभी खाडी देशो की यात्रा का अवसर मिले तो 100 भारतीयों मे 90% लोग इसी प्रान्त के मिलेगे इसे देख कर आपका सीना गर्व से फूल जायेगा उनकी तादाद देख कर अपनी संखिया और शक्ति का अनुभव होता है.लेकिन अफ़सोस …….यह किया….. अगर आप किसी भी उस प्रान्त के मर्द, औरत, बच्चे या उम्रदार आदमी से पहले बार मिलने पर अगर आप का सवाल होता है की भाई आपकी सरज़मीन यानि देश या आप कहा के रहने वाले हो……….. तो उनका तपाक से एक ही जवाब होता है KERALA. है न चौकाने वाला जवाब ऐसा ही एक जवाब मैने सुना.एक बार मै टैक्सी से अपने रूम जा रहा था उस टैक्सी मे 3 लोग और थे .चालक (ड्राईवर)का तलुख पाकिस्तान से था, उस ने बारी-बारी से सबसे पूछा भाई आप लोग कहा कहा के हो, एक ने बोला नेपाल, एक ने बोला बंगला देश, मैने बोला इंडिया, यानि हिन्दुस्तानी जब चौथे महाशय की बारी आये तो उनके प्यारे मुख से एक भारी भरकम जवाब आया… KERALA. इस जवाब को सुनते ही ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर मे किसी ने आग लगा दी हो, जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो…… और मै अपने मुँह को रोक नहीं सका और उनसे प्यार और व्यंग भरे शब्दों मे बोला …. भाई साहिब यह केरला कहा है . मेरे सवाल को सुनते ही सब लोग मेरी तरफ हक्का बक्का हो कर देशने लगे . उस महाशय ने बोला तुमको केरला नहीं मालूम .. मैने बोला भाई मु झको को , बंगला देश मालूम है , नेपाल मालूम है , पाकिस्तान मालूम …… है और जहा तक मेरा सवाल है हिंदुस्तान . यह सुनते ही टैक्सी मे मौजूद सभी लोग मेरे कहने का मतलब समाज गए . तब मैने उन महा पुरुष से बोला भाई अगर हम ही अपनी पहचान को प्रान्तों और भाषा के माध्यम से विदेशो में करेगे या बटे गे तो हमारे विचारो और जीवन शैली का दूसरो पर किया असर पडे गा .आज ज़यादातर गल्फ के देशो मे लोग केरला को एक अलग देश समझते है . जिन गल्फ मे रहने वाले दूसरे देशो के लोग जैसे मिस्र , यमन , फिलिस्तीन , सीरिया आदि लोगो का ज्ञान भारत के बारे मे ज़यादा नहीं है …उनको लगता है की शायाद केरला भारत से लगा हुवा एक छोटा सा अलग देश है . हम देश होगा ....! विदेश या देश हम सब जगह …सिर्फ और सिर्फ एक भारती है . प्रान्तों की पहचान होना निश्चित एक अनोखा अनुभव होता है . लेकिन उन सब से ऊपर है हमारा देश . लेकिन एक बात केरला विशेष के लोगो मे बहुत अच्छी है उनमे हिन्दू , मुस्लिम या इसाई होने का ज़रा सी भी फर्क मह्सून नहीं होता है उनमे प्रान्त सबसे सबसे ज़यादा माएने होता और धर्म के आधार पर पहचाना या अंतर होना के लिए कोई जगह नहीं होती है . उनमे सम्प्रय्दिकता नाम की कोई भी बात नही देखी जा सकती है . देश की विदेशी मुद्रा मे भी इस प्रान्त का विशेष योगदान है क्यों की शायद ही केरला का कोई घर हो जहा से एक आदमी तो अवशया ही गल्फ देशो मे है और उनमे भाषा ही उनकी पहचान का सर्वोतम और सबसे बड़ा शक्तिशाली साधन ( हथियार ) है .

आज हमारे देश की पहचान के लिए भारत का हर इंसान (नागरिक ) कही न कही संघर्ष करता हुआ नज़र आता है , सेना का सैनिक भारत की पहचान, आत्म सम्मान, प्रतिष्ठा बने रखने के लिए सीमा पर संघर्ष कर रहा है , व्यापारी देश का व्यापार को बढ़ने और आय का अधिक से अधिक सोत्र (साधन ) निकालने के लिए संघर्ष कर रहा है ताकि भारत की देश - विदेशी व्यापार मे अपनी पहचान बनी रहे ……. वैज्ञानिक अपनी खोज और अविष्कारों के आधार पर देश (भारत ) की रक्षा के लिया हर वक़्त संघर्ष कर रहा है ताकि हमारे देश भारत की पहचान बनी रहे , अधियापक छात्रों के भविष को एक नया आयाम देने के लिए हर वक़्त संघर्ष करता है . हमारा प्यारा भारत … गले मे लटकती हुवी वह माला है जिसमे कई रंग की मोती पड़ी है . वह माला है जिसका जन्म कई रंग की मोती के मिलने के बाद हुवा … इसी तरह हम पंजाबी , उत्तर भारती , बिहारी , बंगाली , केरला , तमिल , आंध्र वासी …… आदि आदि . सब उस मोतियों की तरह है जो भारत को एक माला का स्वरुप देते है , भारत को एक विशेष पहचान देते है . हमसे ही भारत है और भारत से ही हम है . लेकिन अगर हम भाषा , धर्म , जाती , एरिया और अन्य कारणों से अपने देश को बाटेगे या उसकी अलग पहचान , देश या प्रदेश मे बनायेगे तो एक दिन हम अपनी वास्तविक पहचान ही खो देगे . याद रखिए विभिन् रंगों की मोतियों का अस्तित्व और पहचान सिर्फ माला के रूम मे ही हो सकता है न की अलग राखी हवी एक मोती की तरह . वास्तविक ताक़त तो बंद मुट्ठी मे होती है न की खुले हुवे हाथ मे .हम सब ने अपनी बचपन मे वह कहानी तो ज़रूर पढ़ी होगी की जिसमे एक आदमी अपनी मौत से पहले अपनी सात लड़को को अपने पास बुलाता है और सब को एक एक लकडी लाने को कहता है . जब वे सब लकडी ले आते है तो वो उनको एक सात बांधने को कहता है . उसके बाद वह बारी बारी से उन बाधी हुवी लकडी के गठर को तोड़ने को कहता है लेकिन कोई कामयाब नहीं होता है , फिर वह सब सो अलग अलग लकडी देता है जिसको वह सब तुंरत तोड़ देते है . हम सब अच्छे तरह जानते है की कुछ विदेशी ताकते हमसे हमारी वह सदियों पुराणी पहचान को छीन लेना चाह ती है . हमको भाषा और धर्म के आधार पर बाटकर कमज़ोर कर देना चाहते है . और अगेर इस तरह से हम अपनी अलग पहचान बनाये गे तो हम उनकी अदृश रूप से मदद कर रहे न की अपने को मज़बूत . अब हमको सोचना है की किया सही है और किया गलत .


जय भारत
इसरार अहमद
इंडिया

4 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

आप अच्छा लिखते हैं आपका स्वागत है

Dhiraj Shah ने कहा…

nice post

vinay ने कहा…

sahi kha mere vichar se jaityo aur pranto main nahin batna chayie.

sandhyagupta ने कहा…

Achcha likha hai aapne.Shubkamnayen.

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