रविवार, 19 सितंबर 2010

बुधवार, 23 जून 2010

मेरे कमली वाले की शान ही निराली है - अल मदीना, चल मदीना



बशर हो कर भी वह (NABI – SAW) बशर नहीं
उनकी उम्मत को इसकी खबर नहीं
बशर अगर वह होते तो ऐसा न होता
कंकरों ने भी कलमा पढ़ा न होता

बशर हो कर भी वह (NABI – SAW) बशर नहीं
उनकी उम्मत को इसकी खबर नहीं
बशर अगर वह होते तो ऐसा न होता
क़मर (चाँद) के दो टुकड़े किया न होता

बशर हो कर भी वह (NABI – SAW) बशर नहीं
उनकी उम्मत को इसकी खबर नहीं
बशर अगर वह होते तो ऐसा न होता
शम्स (सूरज) का वक़्त बदला न होता

रविवार, 16 मई 2010


THE LORD OF THE RINGS: यह वाक्य (अभिव्यक्ति) अक्सर भारत के समाचार पत्रों और पत्रिकाओ मे छपता है कि अगर भारत में (एक विशेष वर्ग और धर्म के लिए) क्रिकेट एक धर्म होता निसंदेह सचिन तेंडुलकर उस धर्म मे भगवान कि तरह पूजे जाते आज इसी चर्चा को को आगे बढ़ाते हुवे मुझको यह लेख लिखने का विचार आया सचिन रमेश तेंडुलकर भारत की सर ज़मीन पर 24 अप्रैल 1973 को जन्म लेने (अवतरित होने) वाला एक ऐसा तारा जिसने अपनी चमक से भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व को अपनी कला और कौशल के आगे नमन करने पर मजबूर कर दिया अगर मै सचिन को THE LORD OF THE RINGS कि उपाधि, ख़िताब, नाम, पदवी से पुकारता हू तो शायद किसी को इस पर किसी को एतराज़ नहीं होगा यह क्रिकेट का मैदान दिखने मे एक रिंग ही कि तरह ही होता है अब चाहे यह रिंग भारत का एडेन गार्डेन हो या इंग्लैंड लोर्ड्स का मैदान या ऑस्ट्रेलिया का पर्थ या MELBOURNE CRICKET GROUND (MCG) सभी एक से होते है पर फर्क सिर्फ इतना होता है की कही पर भक्त गण कम कही ज्यादा होते है चलिए इस चर्चा मे शामिल होने से पहेले हम उस LORD के जीवन पर नज़र डाले तेंडुलकर मुंबई में पैदा हुआ थे उनके पिता रमेश तेंडुलकर, एक मराठी उपन्यासकार थे जिन्हों ने अपने बेटे का नाम अपने पसंदीदा संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के नाम रखा तेंडुलकर के बड़े भाई अजित ने उसे क्रिकेट खेलने के लिए प्रोत्साहित किया उसको वह कोच और गुरु, रमाकांत आचरेकर के मार्गदर्शन में क्रिकेट कैरियर और उसकी दिशा निर्देशो (बारीकयो) को समझने के लिए पहुचे अपने स्कूल के दिनों में सचिन ने एमआरएफ (MRF) पेस फाउंडेशन में भाग लिया और वह एक तेज गेंदबाज के रूप में प्रशिक्षित होना चाहते थे लेकिन ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज डेनिस लिली उस में मौजूद थे वह सचिन से गेंदबाज के रूप मे प्रभावित नहीं हुवे और उनको सुझाव दिया कि वह अपनी गेंदबाजी की जगह बल्लेबाजी में ध्यान दे उस महानतम गेंदबाज़ (डेनिस लिली ) ने उनमे एक महान बल्लेबाज की छवि देखी इसी लिए कहा जाता है की हीरे की परख सिर्फ जौहरी ही जानता है जब वह (सचिन) छोटा था वह घंटो नेट पर अभ्यास करता था उसके गुरु आचरेकर अभ्यास के दौरान स्टंप के शीर्ष पर एक रुपया का सिक्का रख देते थे और सभी अभ्यास मे शामिल गेंदबाजो से कहते थे की जो गेंदबाज सचिन को आउट कर देगा वह सिक्का उस गेंदबाज़ को मिलेगा यदि तेंदुलकर अंत तक आउट नहीं होते थे कोच वह सिक्का उसे दे देंते थे तेंडुलकर ने अब तक 13 सिक्के जीता जिसे वह अपने जीवन की सबसे बहुमूल्य संपत्ति के रूप में समझते है आखिर वह दिन आ ही गया जब क्रिकेट की धरती पर किशन की तरह अपनी बासूरी (बल्ला) लेकर सभी को नाचने आगे वह दिन था 11 दिसंबर 1988 जब सचिन की आयु सिर्फ 15 साल और 232 दिनों तेंडुलकर ने पाकिस्तान के खिलाफ कराची में 1989 में अपने वृद्ध पहला टेस्ट मैच खेला सिर्फ 16 वह सिर्फ 15 रन बनाया वकार यूनुस, इमरान खान वसीम अकरम और कई रफ़्तार दार गेंदबाजों का सामना करना पड़ा वह पाकिस्तान के तेज आक्रमण के सामने अपने शरीर पर कई वार-बाउंसर खाया, नाक पर एक बाउंसर द्वारा मारा गया खून बहा लेकिन उसने चिकित्सा सहायता लेने से मना कर दिया है और बल्लेबाजी जारी रखी वह दिन है और आज का दिन है सचिन अपने विरोधी गेंदबाजों को अपने बल्ले ( बासुरी) की धुन पर निरंतर नचा रहे है कभी वह किशन का रूप लेते है तो कभी वह अर्जुन का रूप लेकर अपने लक्ष्य को भेद ने मे कोई कसार नहीं छोडते है कभी वह शंकर का रूप धारण करलेते है और मैदान पर तांडव करने लगते है वह कभी-कभी लिटिल मास्टर या मास्टर ब्लास्टर के रूप में संदर्भित किया जाता है उनके तांडव के अनेक रूप हमने देखे है और जिसका नया रूप हमने उनकी असाधारण पारी भारत और साउथ अफ्रीका 2009/10 का एक ODI मैच जिसमे उन्होने गेंदबाजों को खूब नचाया और सचिन तेंडुलकर ने अपना सर्वोच्च व्यक्तिगत स्कोर बनाया तेंडुलकर ने आराम नहीं किया और सभी गेंदबाजों पर अपनी गोलीबारी के रखा था
सचिन की बल्लेबाजी शैली महानतम बल्लेबाज सर डोनाल्ड ब्रेडमैन की तरह ही थी उन्होने उससे प्रभावित होकर उसको अपने घर पर आमंत्रित किया तेंडुलकर क्रिकेट रुपी अवतार ने अपने खेलने (बल्लेबाजी) की शैली में कई आधुनिक और अपरंपरागत स्ट्रोक (तीरों) शामिल किया ठीक उसी तरह जिस तरह एक देवता अपने तरकश मे अनेक तीर रखते है और समय - समय पर उसका प्रयोग करते है तो अंत मे यह कहना उचित ही होगा की सचिन क्रिकेट के मैदान के अवतार है जिनकी तुलना किसी से करना मुमकिन नहीं है ....तुम जियो हजारो साल और भारत और भारत वासियों को तुम पर नाज़ है.

ISRAR AHMAD
KANPUR- INDIA

बुधवार, 24 मार्च 2010

Women’s Reservation Bill-A War Behind The Wall







Women’s Reservation Bill-A War Behind The Wall

महिला बिल (Bill) .......महिला किल (Kill)......दिले-नादान तुझे हुवा किया है आखिर इस बिल की असल वजह किया है जनाब इस वक़्त मई कोई शायरी के मूड मे नहीं हूँ हमारे देश की नारियो (महिलाओ) की शर्म, लज्जा, श्रद्धा और सम्मान ही देश की तमाम विरासतों मे से एक है चाहे कोई भी धर्म हो, हर धर्म मे साफ़ साफ़ लिखा और कहा जाता है की शर्म महिलाओ का गहना है जो उनकी शोभा बढाता है और उस गहने के बिना वे कैसी लगेगी मेरे इस लेख के लिखने का सार-सिर्फ इतना है की भाई हमको इस बिल के पीछे किया मंशा छुपी है उक्सो भी समझ चाहिए...... मैने अपनी 35 साल की आयु मे दुनिया के करीब 08-10 देशो की यात्रा किया और करीब 02 देशो मे काम करने का सौभाग्य मिला लेकिन नारी और नारी समाज की जो तस्वीर हमारे देश की है वह किसी और देश मे देखने को नहीं मिलती है भारत एक श्रेणीबद्ध समाज है भारतीय समाज में महिलाओं को हमेशा ही चिंता और चर्चा का विषय बनी रहती है .....आज हमारे सामने चर्चा का विषय महिला आरक्षण बिल है...इस बिल का इतिहास आज से करीब 14 साल पुराना है वर्ष 1996 में श्री देवेगौड़ा (पूर्व प्रधानमंत्री) सरकार ने महिला आरक्षण बिल के रूप में 81संविधान संशोधन विधेयक पेश किया लेकिन कुछ कारणों की वजह से यह बिल लोक सभा मे पास नहीं हो सका और दो साल के बाद पुनः 1998 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधान मंत्री) की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के नेतृत्व में यह बिल फिर से 84 संविधान संशोधन विधेयक के रूप में द्वारा 12वीं लोकसभा में पेश किया गया लेखिन पास नहीं हो सका और जब 1999-श्री अटल बिहारी वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री) की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार को फिर से 13वीं लोक सभा में बिल लायी लेकिन फिर वाही हालत रहे और लगातार हर सरकार ने 2002 और 2003 मे फिर पेश किया लेकिन 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के पालन हार और हमारे वर्त्तमान प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने इसे अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम में शामिल है.प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गाँधी के अथक प्रयासों से यह बिल २०१० में राज्यसभा में भरी शोरगुल के बाद पास हो गया लेकिन अभी लोक सभा में इसे मैराथन दौड़ में से गुज़ारना होगा....!
हमारे वर्त्तमान सरकार का कहना है की वह इस बिल के द्वारा महिलाओं सहित समाज के कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्ध है लेकिन इस बिल के अंदर कही न कही हमारी चट्टान से भी मज़बूत संस्कृत ,तहज़ीब,संस्कार और सामाजिक मूल्यों को धक्का पहुचाने, तोड़ना, सेंध लगाना अथवा नष्ट करने की कही न कही शाजिश या बुरी योजनाये पर्दे के पीछे से चल रही है और हमारे राज नेता उस को समझने के योग नहीं है...........! हमारे देश की संस्कृति विश्व में सर्व-श्रेष्ठ, उच्चतम मानी जाती है और इसकी मिसाल दे जाती है और इस तरह आदर्श बनाना का पाठ दूसरे देश सिखाते है और विदेशो से लोग यहाँ पर आते है उनका मकसद यहाँ संस्कृति और समाज को करीब से देखना और समझना और यहाँ आने पर वे इससे प्रभावित होकर जाते है और अपने मन में ठान लेते है की बाकि का जीवन वे इसी तरह से जिएगे परन्तु यह बाते अमरीकी और पश्चिमी संस्कृति से चिपके देशो को रास नहीं आती है और उन्होंने हमारी अमूल्य और अनमोल धरोवारो को मिटा देना चाहते है विश्व की करीब करीब सभी देशो की संस्कार,सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली पूरी तरह बदल चुकी है और उनपर दूसरे देशो (अमरीकी और पश्चिमी संस्कृति) का रंग चढ़ चुका है जबकि मै अपनी पिछले विदेश यात्रायो के दौरान, मैंने भारतीय को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी पाया और उसका कारन सिर्फ और सिर्फ हमारे तहजीब, हमारे विचार, हमारी दृष्टि और हमारी समाज और धर्म की गहरी जड़ें जो दूसरे समाज से अलग रखती है मैं अपना गहरा दुख व्यक्त करना चाहूगा और पाठको से कुछ घटनाओ पर खेद प्रकट करूगा....! वर्ष 1999 की बात है जब मै जर्मनी की यात्रा पर था और अपने एक सरदार दोस्त के पिज्जा सेंटर पर उनके साथ बात कर रहा था तभी वह एक 50 साल का लम्बा-चौड़ा आदमी दाखिल हुवा और उसने बियर की बोतल और पीने लगा कुछ 5 मिनट के बाद एक 30 साल की एक औरत वह आयी और प्रेमालिंगन (चिमटना) करने लगी चूंकि अमरीकी और पश्चिमी संस्कृति में यह बात सामान्य है तो मुझको ज़रा भी शक नहीं हुवा और करीब 10 मिनट के एक 17-18 साल की लड़की और 22-23 साल का एक लड़का भी वही आया और वे भी वही पर प्रेमालिंगन करने लगे जिसको देख कर मेरे मन में एक घृणा (नफ़रत) और कौतूहल सी पैदा हुई जब वे लोग वह से चले गए तब मैने अपने दोस्त से कुछ पूछना चाहा ...लेकिन उसने मेरे चेहरा पढ़ लिया और मेरे कुछ बोलने से पहेले ही वह बोला तुम इस दृश्य को देखकर इतनी घृणा (नफ़रत) और कौतूहल नहीं होगी लेकिन यह जान कर तुम और भी आश्चर्यचकित होगे की वह 50 साल का आदमी अपनी प्रेमिका के साथ था और वह जवान लड़की उसकी (आदमी)बेटी थी और अपने मंगेतर साथ थी और उन दोनों को एक ही स्थान पर प्रेमालिंगन (चिमटना) कर रहे थे और तब उस समय मुझे एक भारतीय होना का गर्व महसूस और मैने अपनी संस्कृति और समाज को धन्यवाद कहा जो आज भी इस इन प्रकार के कचरे (अमरीकी एवं पश्चिमी संस्कृति और समाज) अब भी अछूता है.....!और मुझको फिल्म जुड़वाँ का अन्नू मालिक का गया हुवा वह गीत याद आ गया की ईस्ट या वेस्ट इंडिया इस दी बेस्ट ………….!


अमरीकी एवं पश्चिमी देशो ने हमारे देश की संस्कृति के साथ खेलने का काम तो 15 साल पहले ही शुरू कर दिया था जब लगा तार हमारे देश की खूबसूरत बालाओ (लडकियों ) की मानसिकता पर ख़ौफ़नाक प्रहार आरंभ कर दिया था, और उनको वह लुभावने सपने दिखाना की अगर सुष्मिता और ऐश वार्या इस मुकाम को पा सकती है तो तुम लोग क्यों नहीं लेकिन शायद उन सब लडकियों को मालूम नहीं की वह जगमगाती और तलिस्मी जीवन को पाने के लिए उनको कितनी ही शर्मशार परिस्तिथियों और सीमायों का सामना करना पड़ता है.

यह महिला बिल भी उसकी एक कड़ी है और हमारे समाज मे नर-नारी के बीच से एक शर्म ,लज्जा और सम्मान का का पर्दा हटा देना और उनको विदेशो की तरह की मर्दों के सामानांतर ला कर खड़ा कर देना........ मै यहाँ के बात ज़रूर बता देना चाहता हूँ की मै नारी उत्थान, शिक्षा, रोज़गार के खिलाफ नहीं हू लेकिन अमरीकी एवं पश्चिमी देशो के जिस प्रारूप का अनुसरण हम कर रहे है वह उस मार्ग की तरह है जिसके एक तरफ तो खाई है और दूसरी तरफ कुआ .......हमारे बीच भी मर्द और औरत के बीच के फासले को मिटा देना चाहते है जिस तरह उनके देश में ख़त्म हो चुका है.हम यह कैसे भूल सकते है की यह फ़र्क अल्लाह (ईश्वर) ने खुद बना कर इस धरती पर भेजा है तो हम इस विधि के विधान को कैसे बदल सकते है हम झांक कर देखे उन सभी देशो मे जहा पर स्त्री और पुरुष के बीच का अंतर मिट चुका है और उन सभी देशो की संस्कार,सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली पूरी तरह बदल (मर) चुकी है न बडे छोटे का सम्मान है, न नारी पुरुष …….क्यों की उनकी आधुनिकता और धन की लालसा ने सब ख़त्म कर दिया और धन की धर्म है नारी पुरषों की तरह काम करती है और धन कमाती है और इस कारण वे आजाद मानसिकता की हो जाती है उनपर से जो एक पारिवारिक और सामाजिक बंधन होता है वह धन की चक्की मे दम तोड़ देता है वे सभी ( मर्द-औरत, बच्चे बूढे और जवान ) धन और आधुनिकता रुपी नदी मे अपनी अपनी नाव खुद ही खेना चाहते है किसी का किसी पर नियंत्रण नहीं होता है सब खुद के मालिक मुख़्तार होते है और यही आधुनिक संस्कृति का रूप वह हमारी तरफ धकेलना चाहते है उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ इतना है कैसे हम भारत की नीव को हिला दे लेकिन हम उनके असली मकसद को समझ नहीं पा रहे है पिछले करीब 15सालो से हमारे देश मे अमरीकी एवं पश्चिमी संस्कृति और समाज की काली छाया हमारे देश की गौरवपूर्ण संस्कृति ,समाज,तहज़ीब, संस्कार और सामाजिक मूल्यों पर ग्रहण बन कर छाती चली जा रही है इन देशो ने कई रूपों मे हमारे देश पर प्रहार करना शुरू कर दिया है अपने डिब्बा बंद खानों से हमारे स्वस्थ पर भयंकर प्रहार करना शुरू कर दिया.हम भारतीय जो अपने ढाबों, शाकाहारी और मांसाहारी भोजनों का लुफ्त लेते थे अब इनके नक्शे कदम पर चलते हुवे पिज्जा, पास्ता, चाउमीन या बर्गर के मोहताज हो रहे है न तो पेट की भूख ही ख़ातमा करती है और न नीयत ही भारती है.सिर्फ जेब ही खाली करता है.यह पिज्जा, पास्ता,चाउमीन या बर्गर हमारे सेहत के लिया बहुत ही हानिकारक है यह विभिन प्रकार की बीमारियों को दावत देते है हम अपने नेबू पानी और गन्ने का रस भूल कर डब्बा बंद पेप्सी-कोला की तरफ दौड़ रहे है नतीजा सुगर(रक्तचाप), अधिक मोटापन और काम आयु मे ही बूडा दिखने वाला चेहरा.पैसा वे बनाते है और हम अपनी जान गवाते है वे एक तीर से दो शिकार करते है पहले टेस्ट बेचते है और फिर जब उस टेस्ट के आदी हो जाते है और उसके तरह तरह की बीमारी हो जाती है तब दावा बेचते है यह ठीक उसी तरह से काम करते है जैसे एक कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी एक बार एक Anti -Virus बना ती है फिर उसे से ज़यादा ताकतवर Virus बनती है ताकि पानी के साथ लड्डू भी बिकते रहे
आज प्रिंट मीडिया एवं विभिन रूपों मे अमरीकी एवं पश्चिमी संस्कृति और समाज हमारे घर घर मे घुस गया है और एक ला इलाज रोग की तरह घर के हर सदस को प्रव्हावित कर रहा है.टेलीविज़न पर आज रह तरह के नए-नए और भद्दे=भद्दे प्रोग्राम प्रसारित हो रहे है उदहारण के लिए एक चैनेल पर लव-गुरु नाम का एक प्रोग्राम आता है प्रोग्राम का शीर्षक पढ़ कर ही आप लोग समाज गए होगे की यह प्रोग्राम किस उलटी-सीधी चीजों का मिश्रण लेकर अपनी बात को सार्थक साबित करने का प्रयास करता होगा दरसल यह प्रोग्राम जहा तक मेरा ज्ञान है यह सलमान खान,गोविंदा और कैटरीना की एक फिल्म का रूप है जिसमे लव को कैसे हासिल किया जाये या लव मे क्या-क्या परेशानिया आती है उनकी बारीकियो को समझाता.... मेरे देश के नागरिको प्यार करना न कोई जुर्म है न पाप-प्यार तो जीवन का अभिन अंग है लेकिन प्यार की भी कुछ मरियादाये और सीमाए होती है जिस तरह से इस प्रोग्राम मे प्रस्तुतकर्ता प्यार के लोगो को टिप्स(नुस्खे) देता था और असका बोलने का अंदाज़ देख कर ऐसा लगता था की किसी तरह मै इस प्रोग्राम के प्रसारित स्थल पर चला जाऊ और श्रीमान जी का कान पकड़ कर बहार ले आऊ और बोलो भैया कुछ शर्म है प्यार के बारे मे तो बखान इस तरह देते हो जैसे-कोई मुल्ला या पंडित पूजा के बारे मे बताता है जिस समाज मे शर्म, श्रद्धा और सम्मान मानव जाती की एक ताक़त और विरासत समझी जाती है यह लव-गुरु उस शर्म और श्रद्धा को पैसे कमाने के लिया सारे आम बाज़ार करते है , उस दौरान वे क्या क्या बोल जाते है और यह कभी भी विचार नहीं करते है की उनकी बातो का समाज और समाज के कोमल मन, मस्तिष्क पर क्या असर होगा वे किस रह भटक जाये गे जिस आयु मे हमे उनको गीता-कुरान की सीख देनी चाहिए उस वक़्त हम उनको प्यार की सीख दे रहे है क्या यह हमारे बच्चो को उनके उज्जवल भविष्य से भटकाने की सोची समझी अमरीकी एवं पश्चिमी देशो की राजनीति नहीं है पहले हम उनको उनके देश की तरह प्यार के पाठ बतायेगे फिर उनके नक्शे कदम पर चलते हुवे सेक्स-ज्ञान, सेक्स शिक्षा का मुफ्त दूषित प्रसाद देगे, अमरीकी एवं पश्चिमी संस्कृति संस्कृति हमारे मन-तन सब को ग्रहण लगा रही है जो नारी पहेली शलवार कमीज़, साड़ी मे प्यार की देवी-अप्सरा लगती थी अब वह जींस और टी शर्ट मे आ चुकी है और हम इसको आधुनिकता का प्रतीक मानते है और बोलते है की भारत मे लिंग भेद ख़त्म हो रहा है नारी का उत्थान- तरक़्क़ी हो रही है लेकिन किया यही असली तरक़्क़ी.... शायद नहीं अगर समय रहते हुवे हमने इसपर मंथन नहीं किए तो हमारी संस्कृति और समाज दूसरो की तरह किताबो में ही सिमट जायेगा.. मै नारी की आज़ादी और तरक़्क़ी के खिलाफ नहीं हू लेकिन हमारे देश मे उनकी कुछ सीमाये (हद) है जिस तरह लक्ष्मण ने जंगल मे हिरन का पीछा करने से पहेले सीता जी के लिया एक सीमा रेखा या मर्यादा खीच दी थी और उनको बोला था की इस के बाहर मत जाना लेकिन धर्म का पालन करते हुवे वो रावण (भिखारी के वेश में ) को भिक्षा देने आयी और हरण ली गए ... ठीक उसी तरह हमारी देश की नारी अगर लोक लाज और सीमा रेखा या मर्यादा के बाहर जायेगी तो निश्चित रूप से उनकी लज्जा, शर्म रुपी गहने का हरण होना स्वाभाविक है ..............
कुछ वर्गों ,राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनो के विचार है की इस बिल के द्वारा वे महिलायों को एक नयी दिशा और जीने की राह मिलेगी और वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों को और अच्छी तरह से समझ सकेगी............... देखते है समय चक्र किया खेल खेलता है

शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

गाँधी जी - कल, आज और कल :




गाँधी जी - कल, आज और कल :
शायद ही कोई ऐसा भारतीय होगा जो गाँधी जैसे महान व्यक्तित्व वाले महापुरुष को नहीं जानता और तस्वीर को पहचानता न होगा. यह भारत और भारत-वासीयो का सौ- भाग्य था जो उनके जैसा सर्व गुण संपन महापुरुष मिला जिसने भारत की तस्वीर और इतिहास बदल दिया. उनके और उनके दुवारा बनाई हुए एक संघठन (जिसमे जवाहर लाल नेहरु, लाला लाजपत राय, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, भीम राव आंबेडकर आदि) ने एक जुट होकर, कदम से कदम मिलकर संघर्ष किया और उनके सराहनीय कार्यो की वजह से हम भारत वासियों को एक लम्बे संघर्ष के बाद आज़ादी मिली ...! उनके सराहनीय कार्यो की वजह से हम भारत वासी उनको महात्मा, बापू और राष्ट्री-पिता के नाम से पुकारते है. संस्कृत मे महात्मा (Mahatma or Great Soul ) यानि महान-आत्मा वाला … यानि महान रूह होता है, गुजराती मे बापू का मतलब होता है पिता, और इस बापू शब्द का प्रयोग उनके लिए सबसे पहले हमारे देश के एक महान कवि, लेखक रबिन्द्र नाथ टागोर ने किया था….यानि सम्पूर्ण भारत के लोगो के वह पिता की तरह जाने…. राष्ट्री पिता जाते है……………….!
गांधीजी ने हमारे देश में अनेक उल्लेखनीये काम किये है और हमारे देश में शक्ति शाली नेता के रूप में उभरे उन्होने देश की तस्वीर ही बदल डाली उन्होने देश के नागरिको मे एक नयी आत्मा ड़ाल दी हालाकि उनके दक्षिण अफ्रीका के आने से पहेले भी देश में ब्रिटिश राज्य के खिलाफ कई देश के वरिष्ट और प्राभावी नेता जन संघर्ष कर रहे थे लेकिन उनके आने के बाद एक नयी दिशा मिल गयी उनके सवादों मे और कार्य करने की शैली में एक चमत्कारी और सम्मोहिक शक्ति थी जो कोई भी उनकी तरफ खीचा चला आता था गाँधी जी अहिंसा और सादगी के एक उदाहरण थे भारत मे आने से पहेले उनकी वेश भूषा भी अलग थी लेकिन भारत में कदम रखने के बाद उनकी विचार धरा और वेश भूषा मे 100% बदलाव आया वह पारंपरिक धोती और चादर का इस्तेमाल करते थे वह अपनी चरखे से बनाये हुवे धागों से बनने वाले वस्त्र का ही इस्तेमाल करते थे उनका भोजन शाकाहारी होता था उनके जीवन मे श्रवण और महाराजा हरीश चन्द्र की कथाओ और चरित्र का गहरा प्रभाव था ………………!
लेकिन आज वही भारत और भारतवासियों ने उस अहिंसा और सादगी से रहे वाले बापू की परिभाषा ही बदल डाली है जिन देश के नागरिको के लिए उन्होने जीवन भर संघर्ष किया और अपनी जान तक दे डाली आज वही नागरिक उनके द्वारा किये गए संघर्षो को भूल गए और उनके द्वारा बताये हुवे सदा जीवन सदा भोजन, सत्य-अहिंसा करती जीवन की रक्षा.....! आज उनके मूल्यों की परिभाषा ही बदल डाली है आज गाँधी जी देश के नेता लोगो के लिए केवल 02 अक्टूबर को याद आने वाली तरीक मात्र रह गये है तो दूसरी तरफ चोरो , दलालों, कमीशन बाजों, भ्रष्ट और बेईमान लोगो की पहचान बन गए है .............! अपने लेख गाँधी जी – कल, आज और कल मे, मै कुछ घटनाओ का उल्लेख करूगा मुझको अच्छी तरह याद है आज से करीब 06 साल पहले मेरे एक दोस्त ने एक नयी मारूति कार लिया था और हम दोनों अपने शहर मे घूमने निकले और हाला कि हमारे दोस्त ने नए नम्बर के लिए R.T.O. मे आवेदन पत्र दे दिया था और कार के पीछे उसने A/F (नंबर के लिए आवेदित ) लिख दिया था परन्तु जैसे ही हमारी कार माल रोड पर पहुची तभी एक मोटे-ताजे और लम्बी मूछों वाले दरोगा जी ने हाथ हिलाया और कार को रोकने का इशारा किया चूकि इशारा दरोगा जी कि तरफ से था तो न चाहकर भी कार तो रोकनी ही थी मेरे दोस्त ने कार को किनारे किया और कार से उतर कर हम लोग उनके पास गए....... हम लोगो को देख कर दरोगा जी मुस्कुराये और बोले भाई कार तो नयी और अच्छे रंग कि है.....हमने भी उनकी बात को आगे बढाते हुवे बोले जी साहब 03 दिन हुवे है लेकिन हम उनकी बात का मतलब नहीं समझ सके ...उन्होने तुंरत कहा आप लोग तो अच्छे घर के और शिक्षित मालूम पड़ते है और आप को अच्छी तरह मालूम है कि बिना नंबर के कार चलाना जुर्म है हमने कहा साहेब हमने नंबर के लिए आवेदन कर दिया है और एक दो दिन मे आ जायेगा और हमने उनको कार के असली पेपर भी दिखाए जिसमे कार लेने की तारीख साफ़ लिखी थी.......उन्होने सारे पेपर देखे और बोलो वह सब ठीक है लेकिन हमारा भी तो ख्याल करिये...और बोले कि अगर आप लोग दो लाख कि कार ले सकते है तो किया हमको गाँधी जी के दर्शन भी नहीं करा सकते है.......उनकी यह बात सुनते ही हम उनका मतलब समझ गए.....कि साहब को प्रसाद चाहिए....वक़्त कि नजाकत को समझते हुवे हमने उनको रिश्वत देना उचित समझा मेरे दोस्त ने अपनी जेब में हाथ डाला और सौ का एक नोट निकला और साहब के हाथ मे रखा उस नोट को देखते हुवे वह बोले भाई बडे न समझ हो गाँधी जी का मतलब भी नहीं समझते हो...अरे यह तो छोटे गाँधी है.....असली गाँधी जी तो बडे और हरे हरे होते है........उनकी इस बात को सुनकर हम लोग अंदर से बहुत कुरोधित हुवे लेकिन......हमे लोगो से सुनी हवी एक बात याद आ गए कि मजबूरी का नाम गाँधी जी यानि मजबूरी मे गाँधी जी ही काम आते है.......इस लिए मैने अपनी जेब से 500 का एक नोट निकला और अपनी दोस्त कि कार पर निछावर कर दिया... तो यह था हम भ्रष्ट और बेईमान भारतीयों के लिए गाँधी जी की एक आधुनिक परिभाषा........आये अब आपको मै दूसरा उदहारण देता हूँ जिसे आपको पता चलेगा कि आज भारत-वासियों के मन में गाँधी जी कि किया छवी बन गयी है.....एक बार कि बात है मेरे एक दोस्त जो विदेश (अरब देश) में जाना चाहते थे और उनको जल्दी जल्दी अपना पासपोर्ट बनवाना था......लेकिन पासपोर्ट एक अति महत्पूर्ण एवं वैधानिक विषय है इसलिए.... हमारे दोस्त ने पासपोर्ट से सम्बंधित सभी पेपर पासपोर्ट कार्यालय में जमा कर दिए थे और 15 दिनों के बाद उनकी रिपोर्ट के लिए L.I.U. विभाग से एक महाशय जांच करने आते है....... करीब आधा घंटा पूछताछ करने के बाद जब वह पूरी तरह से संतुष्ट हो जाते है..... तब हमारे मन मे विचार आता है चलो एक ज़रूरी काम हुवा जो पासपोर्ट पाने के लिए एक बहुत महत्पूर्ण क़ानूनी कार्यवाही (प्रक्रिया) मानी जाती है हमने नैतिकता से उनको चाय-पानी कराया .........चलने से पहेले वह श्रीमान बोलो भाई आप लोग किया हमे इसे सूखे सूखे वापस भेज दो गे.....कम से कम मुस्कुराने का मौका भी दो........तब मेरे दोस्त ने पूछा कि श्रीमान हम आपका मतलब नहीं समझे तब उनके मुख से निकला भाई किया आप लोगो ने कभी 500 रूपये का नोट नहीं देखा है... हमने बोला जी देखा है तब उन्होने तपाक से कहा तो फिर अपने उसमे मुस्कुराते हुवे गाँधी जी को भी देखा होगा.......उनको एन शब्दों को सुनकर हम उनका मतलब समझ गए......और हम बोले जी हा उसमे गाँधी जी मुस्कुरा रहे है तब महाशय बोले अगर हमारे बापू मुसकुरा सकते है तो उनके बच्चे क्यों नहीं..... .उन्होने हमेशा मुस्कुराने कि सलाह दी है और हमे भी उनके पथ पर चलना चाहिए लेकिन वह महाशय शायद भूल गए की गाँधी जी ने सत्य-अहिंसा पर भी चलने की शिक्षा दी थी....हमने बात को आगे न खीच कर उनकी सेवा करना उचित समझा......

शायद यह हमारा दुर्भाग है कि हमारे बापू से सम्बंधित कुछ सामग्री सन् 2009 में नीलाम हो रही थी और उस धरोवर को बचाने के लिया कोई आगे नहीं आ रहा था उनके पारिवारिक सदस्य (तुषार गाँधी) ने कहा कहा उसको नीलम होने से बचाने के लिया गुहार लगाई उसके लिए उन्होने एक बैंक खाता भी खोला और देश के नागरिको से उसमे धन देने को कहा लेकिन.......हम एक अरब से ज़यादा भारतीय मूक दर्शक बने यह तमाशा देखते रहे.....हमारे देश मे अनेक इसे औधोगिक घराने है जो करोडो रूपया पानी कि तरह बहा देते है लेकिन वह बापू के दुवारा किये गए प्रयासों और संघर्षो को भूल गए.....वह तो भला करे उस इंसान का (विजय माल्या) जिसने प्रयासों और धन से उनकी अमूल धरोवर को वापस भारत को लाकर के दिया....ठीक इसी तरह उसने ....टीपू सुलतान कि तलवार (धरोवर) कि भी रक्षा कि थी......अगर हम एक अरब भारतीय सिर्फ एक एक रूपया जमा करते तो हम को ...........सबसे ज़यादा दुखद........लज्जित होने वाले क्षण का सामना ही नहीं करना पड़ता… हम भारतीय क्रिकेट मैच मे नाचने वाली –बालाओ (Cheer-Girls) पर लाखो रूपया खर्च कर देते है लेकिन जहा हमारे महापुरषों, धरोवारो और भारत के आत्म सम्मान कि बात आती है तो हमारे खाते सूने और हम सब से गरीब हो जाते है......अरे अगर हम अपने महापुरषों और धरोवारो के लिए कुछ नया कर नहीं सकते तो कम से कम उनकी पुरानी चीजों को तो मिटने न दे.....हमारे देश के लोगो ने इस खबर को चटखारे लेकर पढ़ा और समाचार पत्रों ने खूब लिखा.... लेकिन किया हमारी अंतर-आत्मा ने एक बार भी सोचा कि बाहर के मुल्को मे हम हँसी के पात्र बनते रहे........ और विदेशी यह सोचते रहे कि किया भारतीयों ने उस इंसान को भुला दिया जिसने उनके लिए अपने जीवन को दाव पर लगा दिया था…….!

हम जब भी अपने नेता गण से भारत और भारत वासियों की चर्चा करते है तो शायद ही उनके शब्द कोष मे कोई भी ऐसा प्रसंशा का शब्द बाकी बचता होगा जो वह महा पुरषों और भारत के इतिहास पर इस्तेमाल करते (बोलते) न करते होगे और बोलते है मेरा भारत महान....मेरा भारत महान....मेरा भारत महान....महानता तो तब है जब हम लोग सिर्फ अपने ही मुँह से महान महान न चिल्लाये बल्कि पूरा विश्व एक सुर में बोले वाकई भारत महान है .....हम सिर्फ खुशफहमी मे अगर रहे और बोले की मेरे भारत महान ..... तो ठीक नहीं है.....नि संदेह...हमारा भारत कई माय ने में महान है.....लेकिन हमारे कुछ कार्य उसकी महानता पर पानी फेर देते है......
जिस तरह से भौतिकवाद-आधुनिकता हम भारतीयों के सर पर चढ़ कर बोल रही है तब यह तो वक़्त ही बतायेगा की ....आगे आने वाले समय में....गाँधी जी और उनके जैसे कितने ही महापुरुष....सिर्फ किताबो मे ही सिमट जायेगे ......

जय भारत जय भारतवासी
इसरार अहमद

कानपुर, इंडिया

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